22/12/2017   अब ‘फास्ट’ हुई घुटने की सर्जरी और रिकवरी
स र्जरी के बाद मरीज के लिए सीढ़ी चढऩा विषेश रूप से आसान हो जाता है। सर्जरी के मात्र तीन घंटे बाद ही रोगी सहारा लेकर चलने लगता है। सर्जरी के दूसरे दिन, रोगी खुद वॉष रूम जाने लायक हो जाता है। सर्जरी के बाद 10 दिन में रोगी बिना किसी सहारे के चलने लगता है।

60 साल से अधिक उम्र की लगभग 42 प्रतिशत महिलाएं और 21 प्रतिषत पुरुश घुटने की ऑस्टियोआर्थराइटिस से पीडि़त होते हैं। घुटने की आर्थराइटिस या ओस्टियो आर्थराइटिस के बहुत अधिक बढ़ जाने के कारण जब मरीज का चलना-फिरना दूभर हो जाता है तो अक्सर आर्थोपेडिक्स विषेशज्ञ घुटने बदलवाने (टोटल नी रिह्रश्वलेसमेंट) की सलाह देते हैं। टोटल नी रिह्रश्वलेसमेंट (टीकेआर) सबसे सफल ओर्थोपेडिक प्रक्रियाओं में से एक है और यह पिछले 30 वर्षों से की जा रही है। मौजूदा समय में भारत में हर साल लगभग एक लाख घुटना प्रत्यारोपण होता है। और इसमें हर साल 20 प्रतिषत वृद्धि होने की संभावना है।

 वरिश्ठ ज्वाइंट रिह्रश्वलेसमेंट एवं आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. (प्रो.) अमित पंकज अग्रवाल बताते हैं कि पिछले कुछ समय के दौरान नई तकनीकों के विकसित होने तथा घुटने कीे बायोमेकैनिक्स के बारे में जानकारियों में विस्तार आने के कारण टोटल नी रिह्रश्वलेसमेंट की सर्जरी अब बहुत आसान, कम कश्टप्रद और बहुत अधिक कारगर हो गई है। हालांकि इसे टोटल नी रिह्रश्वलेसमेंट कहा जाता है लेकिन इसे नी रिसरफेसिंग कहना ज्यादा उपयुक्त है-क्योंकि इसमें मरीज के घुटने की सतह को बदला जाता है और मरीज को प्राकृतिक हड्डी के साथ कोई बदलाव नहीं किया जाता है। इस सर्जरी के बाद मरीज को घुटने के दर्द से मुक्ति मिलती है और मरीज चलने-फिरने लगता है। यह सर्जरी आर्थराइटिस के मरीजों में बहुत ही सफल सिद्ध हुई है। इससे जोड़ों को मोडऩे में तकलीफ नहीं होती, दर्द से राहत मिलती है और जोड़ों की विकृति भी ठीक की जा सकती है। ऑपरेषन के बाद दर्द को काबू में रखने तथा दर्द रहित फिजियोथेरेपी के नए तौर- तरीकों के कारण अब रोगी बहुत जल्द सामान्य कामकाज करने में सक्षम हो जाता है।डॉ. अग्रवाल बताते हैं कि टोटल नी रिह्रश्वलेमेंट में अब ‘‘फास्ट ट्रैक नी रिह्रश्वलेसमेंट’’ एक नया आयाम भी जुड़ गया है जिसके कारण अब मरीज सर्जरी के छह घंटे में ही कुछ कदम लेने में सक्षम हो जाता है और मरीज को षीघ्र अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है। इसकी मदद से घुटने प्रत्यारोपण की प्रक्रिया कम दर्द वाली बन गई है, मरीज की रिकवरी तेज हो गई है तथा दर्द के बिना फिजियोथिरेपी कराई जाने लगी है तथा काफी अच्छे परिणाम आने लगे हैं। सर्जरी में बहुत कम समय लगता है तथा सर्जरी के बाद मरीज जल्दी चलने-फिरने लगता है और उसे जल्द ही अस्पताल से छुट्टी मिल जाती
है। फास्ट ट्रैक सर्जरी में कम्ह्रश्वयूटर नेविगेशन तकनीक का इस्तेमाल सर्जरी को न केवल अधिक कारगर, सटीक और सुरक्षित बनाती है बल्कि इससे समय की भी बचत होती है और मरीजों को सर्जरी के दौरान कम से कम परेशानी उठानी पड़ती है। साथ ही साथ सर्जरी में भी कम समय लगता है। यूं तो इसका इस्तेमाल अनेक तरह की सर्जरी में हो सकता है लेकिन घुटने की रिसर्फेसिंग एवं रीढ़ की सजरी में यह तकनीक बहुत ही फायदेमंद साबित हो रही है। इस तकनीक से सर्जरी करने पर काफी बेहतर परिणाम आते हैं और बहुत छोटे चीरे लगाने पड़ते हैं जिससे जख्म जल्द भरता है।

इसके अलावा जोड़ बदलने के दौरान जो इम्ह्रश्वलांट लगाया जाता है उसकी एलाइनमेंट सही एवं सटीक होती है जिसके कारण इम्ह्रश्वलांट लंबे समय तक सुचारू तरीके से काम करता रहता है। इसके अलावा इस तकनीक से सर्जरी करने पर मरीज के साथ जटिलताएं उत्पन्न होने की आशंका काफी हद तक कम हो जाती है। मरीज के पीडि़त हिस्से में दोबारा ऑपरेशन करने की जरूरत काफी कम हो जाती है। मरीज को तेजी से स्वास्थ्य लाभ होता है और वह शीघ्र सामान्य कामकाज करने लगता है। आधुनिक आर्थोपेडिक नेविगेशन प्रणाली में मरीज को सीटी या एक्स- रे जैसी मशीनों के विकरण के संपर्क में नहीं आना पड़ता है। फास्ट ट्रैक नी रिह्रश्वलेसमेंट के तहत मरीज की जिस दिन सर्जरी की जाती है उससे पहले की रात भर्ती किया जाता है। सर्जरी सिंगल शॉट स्पाइनल एनेस्थेसिया से शुरू होती है जो स्पाइनल एनेस्थेसिया की अवधि को कम करती है और मरीज दो से तीन घंटों के भीतर अपनी पैर की शक्ति को वापस पा लेता है। सर्जरी के दौरान रक्त के बहाव को रोकने वाले बैंडेज (टौनिकिट) का उपयोग नहीं किया जाता है और इसलिए मरीज को सर्जरी के बाद दर्द कम होता है। सर्जरी के दौरान ही दवाइयों के मिश्रण (कॉकटेल) का इस्तेमाल किया जाता है जिससे सर्जरी दर्दरहित हो जाती है। इसके अलावा, यह एक मिनीमल इनवैसिव सर्जरी है। इसमें त्वचा में छोटा चीरा लगाया
जाता है, ऊतकों में कम चीर-फाड़ की जाती है और रक्त का कम नुकसान होता है। इससे पोस्ट-ऑपरेटिव दर्द कम हो जाता है और रोगी जल्द चलने-फिरने लगता है और जल्द रिकवरी होती है। फास्ट ट्रैक नी रिह्रश्वलेसमेंट के तहत, सर्जरी में वुंड ड्रेन और यूरिनरी कैथेटर का उपयोग नहीं किया जाता है जिससे पोस्ट-ऑपरेटिव संक्रमण होने की संभावना कम हो जाती है। ऋफास्ट ट्रैकग एक ऐसा दृष्टिकोण है, जिसमें मरीज को सर्जरी के दो घंटों के बाद ही चलने की इजाजत मिल जाती है जिससे डीयूटी, छाती और मूत्र संबंधी जटिलता होने की संभावना कम हो जाती है। इससे रोगियों का आत्मविश्वास और मनोबल बढ़ता है जिससे बेहतर और तेज़ी से पुनर्वास में मदद मिलती है। यह तकनीक सॉफ्ट ऊतकों के अनुकूल है और विभिन्न प्रकार के ऐसे तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें रक्त की कम हानि होती है। इसके कारण रोगियों में खून चढ़ाने की आवश्यकताआ लगभग नगण्य होती है।


Back

गांव नाथूपुर में अवैध कब्जे हटाकर जमीन खाली कराया
अनाधिकृत निर्माणों पर निगम सख्त
नीलांचल सोसायटी ने केरल त्रासदी के लिए गुरुग्राम में चलाया सहयोग संग्रह अभियान
तीन विकास कार्यों के टेंडर को दी गई मंजूरी
बादशाहपुर के हर गांव में कराए गए काम
बार एसो. ने केरल बाढ़ पीडि़तों के लिए दिए एक लाख 51 हजार
कैरियर गाइडेंस कार्यक्रम : छात्रों को दिए गए सफलता टिह्रश्वस
नशा रोकने के लिए कदम उठा रही है सरकार
स्वच्छता पखवाड़े के तहत इंडियन ऑयल ने बांटे डस्टबीन
एसएमडी स्कूल में रक्षाबंधन मनाया गया
आदर्श पब्लिक स्कूल (एपीएस 20) में मनाया गया ईद उत्सव
पंजाब को आगे बढ़ाएगा स्टार्टअप शिखर सम्मेलन
क्या हाल मिस्टर पांचाल में कन्हैया की भूमिका निभा रहे मनिंदर सिंह इस साल रक्षा बंधन का जश्न कैसे मना रहे हैं?
मुस्कान में आरती की भूमिका निभा रहीं अरीना डे इस साल रक्षा बंधन कैसे मना रही हैं?
लूट के प्रयास का एक आरोपी काबू
सोमवार से विधानसभा में हंगामे के आसार खैहरा गुट ने विधानसभा के बाहर लगाए सरकार के खिलाफ नारे
15 साल के शार्दुल को डबल ट्रैप में रजत
रमणीक स्थल बनाए जाने के बदले में लोगों को दिया डंपिग सेंटर
अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर रखे जाएंगे बड़े प्रोजेक्टों के नाम
बच्चें समाज का अभिन्न अंग : रामबिलास
Copyright @ 2017.