अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी द्वारा नई दिल्ली में आयोजित पत्रकार वार्ता विवादों में घिर गई, क्योंकि इसमें किसी भी महिला पत्रकार को प्रवेश नहीं दिया गया। इस घटना ने न केवल पत्रकारिता समुदाय में आक्रोश जगाया, बल्कि यह चर्चा का केंद्र बन गई कि क्या भारतीय धरती पर इस तरह की भेदभाव-प्रधान रणनीति स्वीकार्य है।
मुत्ताकी ने इस प्रेस वार्ता के बाद भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की। वार्ता के बाद आयोजित मीडिया संवाद में लगभग 17 मीडिया घरानों को निमंत्रण भेजे गए थे, लेकिन उन निमंत्रणों में केवल पुरुष संवाददाताओं को शामिल किया गया। महिला पत्रकारों को घटना स्थल पर आने से रोका गया, जबकि उनके उपस्थित होने की कोशिशों पर यह बताया गया कि “सीटें भर गई है , हालांकि तस्वीरों में कई खाली कुर्सियाँ नजर आईं।
इस भेदभावपूर्ण निर्णय ने पत्रकारों और सामाजिक मीडिया पर तीखी आलोचनाएँ झेलीं। कई पत्रकारों ने पूछा कि कैसे यह भेदभाव भारत की राजधानी में हो सकता है, और भारतीय मीडिया और पुरुष पत्रकारों की निष्क्रियता पर भी सवाल उठाए गए। विपक्षी नेता और कार्यकर्ता भी इस घटना को “महिला अपमान” और “न्याय व समानता का उल्लंघन” बताते हुए केंद्र सरकार और विदेश मंत्रालय से स्पष्टता की मांग करने लगे।
विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया
घटना के तुरन्त बाद, भारत के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि वे उस पत्रकार वार्ता में कोई भूमिका नहीं रखते। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रेस मीट का आयोजन अफगानिस्तान के अधिकारियों द्वारा उनके दूतावास में स्वतंत्र रूप से किया गया था, और भारत की सरकार या मंत्रालय को इसमें भागीदारी नहीं दी गई थी।
मंत्रालय का यह कहना था कि भारतीय क्षेत्रीय नियमों के अनुसार, दूतावास परिसर विदेश सरकारों की संवैधानिक क्षेत्राधिकार में आते हैं और भारत की सरकारी एजेंसियों को उनका आयोजन नियंत्रित करने का अधिकार नहीं है। मंत्रालय ने इस तरह की आयोजन प्रणाली में शामिल होने या उसमें हस्तक्षेप करने का खंडन करते हुए कहा कि मीडिया आमंत्रणों की व्यवस्था अफगान भेजी गई सूची से हुई होगी।
मंत्रालय की सफाई आने वाले समय में राजनीतिक दबाव और लोक आलोचना को नियंत्रण में लाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इस जवाब ने मीडिया और लोकतंत्र समर्थक समूहों के सवालों को शांत नहीं किया। कई विश्लेषक इस दृष्टिकोण को निचले स्तर की कूटनीति मान रहे हैं , यह दर्शाते हुए कि राजनयिक सम्मान और महिला अधिकारों के बीच संतुलन कैसे रखा जाए।
इस पूरे विवाद ने इस सत्य को उजागर किया है कि भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र होने के नाते अपनी धरती पर किसी भी प्रकार के लैंगिक भेदभाव को स्वीकार नहीं कर सकता। महिला पत्रकारों को खुले और निष्पक्ष रूप से संवादों में शामिल करना आवश्यक है ताकि मीडिया आज़ादी और लिंग समानता की भावना सुदृढ़ बनी रहे।












