अंग्रेजी शासन काल से इन बहुमूल्य जड़ी बूटियों को वर्किंग प्लान का हिस्सा नहीं बनाया गया जिस
कारण इनको उगाने की व्यवस्थाएं भी पनप नहीं सकीं। छोटा मोटा उखाडऩे का परमिट जारी करने और
एक्सपोर्ट परमिट जारी करने के बाद अपने कत्र्तव्यों की इतिश्री मान ली गई…
कशमल हिमालय क्षेत्र में पाई जाने वाली एक बहु उपयोगी औषधि है। इसे चंबा में कसैह्बल, संस्कृत में
दारू हरिद्रा, गढ़वाल में किन्गोड़ा, हिंदी में दारू हल्दी कहा जाता है। यह झाड़ीनुमा पौधा है, जिसकी
ऊंचाई 7-8 फुट तक होती है। इसकी तीन-चार प्रजातियां हैं जो निचले से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में उगती हैं।
कशमल के फल बच्चे चाव से खाते हैं। जंगली जानवर बंदर आदि का भी पसंदीदा आहार है। इनकी
पत्तियां भेड़ बकरी के लिए पौष्टिक चारा हैं। इसके फूलों पर मधुमक्खी काम करती है। इसकी जड़ों से
रसोंत नामक औषधि बनाई जाती है। इसके अलावा अनेक बीमारियों में उपचार हेतु इसका उपयोग होता
है। इस वजह से औषधि उद्योग में इसकी बहुत मांग रहती है। इसी कारण कशमल का अवैध दोहन बड़े
पैमाने पर होता रहता है। चिपको आन्दोलन के दौर में भटियात क्षेत्र और चंबा के साथ लगते जडेरा क्षेत्र
से कशमल संरक्षण के लिए आवाज उठाई गई थी। भटियात के छुआला गांव और धरवाई गांव से करीब
एक ट्रक कशमल की जड़ें जो अवैध रूप से निकाली गई थी, आन्दोलनकारियों ने जब्त करवाई थी। जडेरा
में बहुत बड़े पैमाने पर अवैध रूप से कशमल उखाड़ा गया था, जिसे जनता बैरियर लगा कर रोका गया
था और जब्त करवाया गया था। सरकारी जंगल से कशमल उखाडऩे पर रोक लगी थी। आज तक वह
रोक तो जारी है, किन्तु अवैध धंधे वाले निजी भूमि से परमिट लेकर सरकारी जंगलों से अवैध रूप से
उखाड़ कर ले जाते हैं। गत वर्ष चंबा के चुराह और सलूनी तहसील के कुछ जागरूक लोगों द्वारा इसके
विरुद्ध आवाज उठाई गई थी।
कांगड़ा के बैजनाथ से भी ऐसी खबरें आई थीं। प्रदेश के दूसरे हिस्सों से भी इस तरह की अवैध रूप से
कशमल उखाडऩे की खबरें आती रही हैं। स्थानीय स्तर पर 20-30 रुपए प्रति किलो खरीद कर आगे
कंपननियों को भारी मुनाफे पर व्यापारी लोग बेचते हैं। दवाई बन जाने के बाद तो इसकी कीमत बहुत
बढ़ जाती है। थोड़े से लाभ के लिए किसान अपना बहुत बड़ा नुकसान कर लेते हैं। कशमल को बचा कर
यदि उस पर भेड़-बकरी पालन और मधुमक्खी पालन किया जाए तो इससे कहीं ज्यादा कमाई किसान
कर सकते हैं। इसके अलावा कशमल की जड़ें बहुत गहरी होती हैं जिनको उखाडऩे के लिए 4 से 5 फुट
गहरे तक खुदाई करनी पड़ती है जिससे पहाड़ी ढलानें कमजोर हो जाती हैं और बरसात में भूस्खलन का
कारण बनती हैं। इसलिए जरूरी है कि कशमल को बचाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं। भले ही
इसके व्यापारिक दोहन पर सरकारी जंगल से प्रतिबन्ध लगा है किन्तु शातिर ठेकेदार स्थानीय लोगों को
बेवकूफ बना कर सांठगांठ कर लेते हैं और निजी भूमि से उखाडऩे का परमिट ले लेते हैं। जबकि निजी
भूमियों में बहुत ही कम मात्रा में कशमल उपलब्ध होता है। अत: निजी भूमि के नाम पर असल में दोहन
सरकारी जंगलों से होता है। हैरानी की बात यह है कि जब भी निजी भूमियों से कशमल उखाडऩे का
परमिट दिया जाता है तो उस भूमि में कितने झाड़ कशमल के हैं, यह क्यों नहीं जांचा जाता। अगर
परमिट जारी करने के समय यह जांच हो जाए तो पता लग जाएगा कि कितनी मात्रा में कशमल
उपलब्ध हो सकती है। निर्धारित मात्रा से ज्यादा जड़ें मिलने पर ठेकेदारों पर शिकंजा कसा जा सकता है।
यह जरूरी सावधानी बरती ही जानी चाहिए। इसके अलावा बहुत से देशों में कशमल की खेती की
संभावनाओं को भी विकसित किया जा रहा है। हमारे देश में भी कशमल की खेती आरंभ की जानी
चाहिए ताकि जंगल से कशमल को न उखाड़ा जाए और अपने खेतों से इसकी फसल तैयार करने की ओर
बढ़ा जा सके। इसमें दस से बीस साल का समय तो लगेगा किन्तु खैर आदि तैयार करने में भी तो
इतना ही समय लग जाता है।
इसके प्रचार के लिए सबसे अच्छा तरीका कटिंग लगाने का है। 10 सेंटीमीटर लंबी और एक सेंटीमीटर
ब्यास की कटिंग लेकर उसे रूटेक्स हार्मोन से उपचारित करके जमीन में लगाया जाता है। इस विधि से
80 फीसदी कटिंग कामयाब पाई गई हैं। पूरी जानकारी जड़ी बूटी खेती पर शोध करने वाले संस्थानों से
ली जा सकती है। स्थानीय समुदायों में कशमल के जंगलों के आसपास भेड़-बकरी पालन और मधुमक्खी
पालन को प्रोत्साहन देकर भी स्थानीय लोगों को वैकल्पिक आय उपलब्ध करवाई जा सकती है। इसकी
अधिकांश किस्में सदाबहार हैं और पूरा साल बकरी के लिए चारा दे सकती हैं। बीस तीस कशमल की
झाडिय़ों पर एक बकरी को पाला जाए तो साल भर में वह बकरी 6 से 8 हजार तक बिक सकती है। इस
तरह की जागरूकता जानकारी किसानों तक पहुंचा कर कशमल संरक्षण के लिए रुचि पैदा की जानी
चाहिए। ऐसी जमीनें जहां बंदरों आदि वन्य पशुओं के कारण खेती करना कठिन हो गया है, वहां कशमल
की खेती जड़ें निकाल कर बेचने के लिए भी की जा सकती है। कशमल की एक खूबी यह भी है कि ये
पेड़ों के नीचे छाया में भी कामयाबी से उग सकती है। सरकार इस तरफ ध्यान दे तो किसानों को आय
होगी और परिस्थिति तन्त्र को सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। इसके फलों को जंगली पशु-पक्षी भी
खाते हैं। इससे खेती में वन्य पशुओं द्वारा नुकसान में भी कमी आ सकती है। हम जितना प्रकृति की
रक्षा के साथ जुड़ कर रोजी कमाने के रास्ते निकालेंगे, उतना ही हमारी आजीविका टिकाऊ होगी और
जीवन सुरक्षित होगा।
इससे लोगों का स्वार्थ संरक्षण की दिशा में मोड़ा जा सकता है। इसके लिए वन विभाग को भी अपनी
मानसिकता बदलनी पड़ेगी। अंग्रेजी शासन काल से इन बहुमूल्य जड़ी बूटियों को वर्किंग प्लान का हिस्सा
नहीं बनाया गया जिस कारण इनको उगाने की व्यवस्थाएं भी पनप नहीं सकीं। इन्हें माईनर वन उपज
माना गया। छोटा मोटा उखाडऩे का परमिट जारी करने और एक्सपोर्ट परमिट जारी करने के बाद अपने
कर्तव्यों की इतिश्री मान ली गई। अभी कुछ हद तक चिंता की जाने लगी है, किन्तु चाक चौबंद व्यवस्था
कब खड़ी होगी, कोई नहीं जानता। हर बरसात में बाढ़ और भूस्खलन की चपेट में आ रहे हिमाचल में
सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह कशमल और अन्य भूस्खलन रोकने वाली जड़ी-बूटियों और
झाडिय़ों के संरक्षण के लिए सख्त कदम उठाने का कार्य करे।












