22 फरवरी नई दिल्ली अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की जेएनयू इकाई ने
प्रशासन की तानाशाही और वामपंथी छात्रसंघ की साठगांठ को लेकर सवाल खड़े किए है। एबीवीपी के
अनुसार एक ओर विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा अनुशासन के नाम पर बेलगाम तानाशाहीपूर्ण निर्णय
थोपे जा रहे हैं, जबकि दूसरी ओर वामपंथी छात्रसंघ का अवसरवादी और पाखंडी चेहरा भी पूरी तरह
उजागर हो चुका है।
इन दोनों के बीच सामान्य छात्र, उसका शैक्षणिक भविष्य और विश्वविद्यालय का लोकतांत्रिक
वातावरण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। छात्रहित के नाम पर राजनीति करने वाले वामपंथी संगठनों
ने सदैव चयनात्मक विरोध की नीति अपनाई है। जब एबीवीपी के कार्यकर्ताओं एवं सामान्य छात्रों पर
एकतरफा कार्रवाई, भारी-भरकम जुर्माने और निष्कासन जैसे कठोर आदेश जारी किए, तब तथाकथित
प्रगतिशील छात्रसंघ और जेएनयू छात्र संघ के प्रतिनिधियों ने एक शब्द तक नहीं कहा। सीपीओ
मैनुअल के विषय में भी वामपंथी गुटों का दोहरा चरित्र सामने आया।
एबीवीपी जेएनयू का यह स्पष्ट मत है कि एबीवीपी कार्यकर्ताओं पर लगाए जुर्मानों और निष्कासन के
समय मौन साधने वाले वामपंथी गुटों का आज स्वयं निष्कासन का सामना करना प्रशासन के साथ
उनकी पूर्व साठगांठ का परिणाम है। जो लोग सत्ता के साथ खड़े होकर दूसरों पर हो रहे अन्याय पर
चुप रहते हैं वह आज नैतिक आधार खो चुके हैं। एबीवीपी जेएनयू अध्यक्ष मयंक पंचाल ने कहा कि
एबीवीपी प्रारंभ से ही छात्रहित, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक मूल्यों की पक्षधर रही है। हमने सीपीओ
मैनुअल के लागू होने के दिन से ही इसका विरोध किया है। यह मैनुअल छात्रों की अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर आघात करता है। जब हमारे कार्यकर्ताओं पर अन्यायपूर्ण जुर्माने लगाए
गए और निष्कासन की कार्रवाई की गई, तब तथाकथित छात्रसंघ मौन रहा। आज वही लोग कक्षाएं
बाधित कर छात्रहित की बात कर रहे हैं। भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की जेएनयू इकाई ने
प्रशासन की तानाशाही और वामपंथी छात्रसंघ की साठगांठ को लेकर सवाल खड़े किए है। एबीवीपी के
अनुसार एक ओर विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा अनुशासन के नाम पर बेलगाम तानाशाहीपूर्ण निर्णय
थोपे जा रहे हैं, जबकि दूसरी ओर वामपंथी छात्रसंघ का अवसरवादी और पाखंडी चेहरा भी पूरी तरह
उजागर हो चुका है।
इन दोनों के बीच सामान्य छात्र, उसका शैक्षणिक भविष्य और विश्वविद्यालय का लोकतांत्रिक
वातावरण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। छात्रहित के नाम पर राजनीति करने वाले वामपंथी संगठनों
ने सदैव चयनात्मक विरोध की नीति अपनाई है। जब एबीवीपी के कार्यकर्ताओं एवं सामान्य छात्रों पर
एकतरफा कार्रवाई, भारी-भरकम जुर्माने और निष्कासन जैसे कठोर आदेश जारी किए, तब तथाकथित
प्रगतिशील छात्रसंघ और जेएनयू छात्र संघ के प्रतिनिधियों ने एक शब्द तक नहीं कहा। सीपीओ
मैनुअल के विषय में भी वामपंथी गुटों का दोहरा चरित्र सामने आया।
एबीवीपी जेएनयू का यह स्पष्ट मत है कि एबीवीपी कार्यकर्ताओं पर लगाए जुर्मानों और निष्कासन के
समय मौन साधने वाले वामपंथी गुटों का आज स्वयं निष्कासन का सामना करना प्रशासन के साथ
उनकी पूर्व साठगांठ का परिणाम है। जो लोग सत्ता के साथ खड़े होकर दूसरों पर हो रहे अन्याय पर
चुप रहते हैं वह आज नैतिक आधार खो चुके हैं। एबीवीपी जेएनयू अध्यक्ष मयंक पंचाल ने कहा कि
एबीवीपी प्रारंभ से ही छात्रहित, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक मूल्यों की पक्षधर रही है। हमने सीपीओ
मैनुअल के लागू होने के दिन से ही इसका विरोध किया है। यह मैनुअल छात्रों की अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर आघात करता है। जब हमारे कार्यकर्ताओं पर अन्यायपूर्ण जुर्माने लगाए
गए और निष्कासन की कार्रवाई की गई, तब तथाकथित छात्रसंघ मौन रहा। आज वही लोग कक्षाएं
बाधित कर छात्रहित की बात कर रहे हैं।












