सड़क पर चलते हुए हम अक्सर यह मान लेते हैं कि नियम सिर्फ गाड़ियों के लिए होते हैं। पैदल
चलना तो सबसे सरल काम है, इसमें भला नियम क्या होंगे? लेकिन यही सोच हर साल हजारों
जिंदगियों की कीमत बन जाती है। भारत में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों में बड़ा हिस्सा पैदल
यात्रियों का है। यह केवल तेज रफ्तार या लापरवाही से वाहन चलाने का नतीजा नहीं, बल्कि पैदल
चलने के गलत तरीकों का भी गंभीर परिणाम है। बचपन से हमें सिखाया गया कि “सड़क पर बाएं
चलो”, यह सीख इतनी गहरी बैठ गई कि हमने कभी उस पर सवाल ही नहीं उठाया। समय बदला,
ट्रैफिक बढ़ा, सड़कें तेज हुईं, लेकिन हमारी आदतें वहीं की वहीं रहीं। अब वक्त आ गया है कि हम
इस अधूरी सीख को पूरा करें और समझें कि पैदल यात्रियों के लिए सही दिशा कौन-सी है।
जहां सड़क पर फुटपाथ नहीं है, वहां पैदल यात्रियों को दाईं ओर चलना चाहिए। इसका कारण बेहद
सीधा और जीवनरक्षक है। जब आप दाईं ओर चलते हैं तो सामने से आने वाले ट्रैफिक को देख सकते
हैं। खतरा आपकी आंखों के सामने होता है, पीठ पीछे नहीं। सामने से आती गाड़ी की गति, दूरी और
ड्राइवर का व्यवहार देखकर आप समय रहते किनारे हो सकते हैं। इसके उलट जब आप बाईं ओर
चलते हैं तो वाहन पीछे से आते हैं। हॉर्न सुनाई न दे, मोबाइल पर ध्यान चला जाए या सड़क पर
शोर हो, तो पीछे से आई तेज रफ्तार गाड़ी जानलेवा साबित हो सकती है। दाईं ओर चलने का नियम
डराने के लिए नहीं, बचाने के लिए है।
दुनिया के कई देशों में यह बात सामान्य समझ का हिस्सा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, ब्रिटेन का
हाईवे कोड और कई अंतरराष्ट्रीय रोड सेफ्टी गाइडलाइंस साफ कहती हैं कि जहां फुटपाथ न हो, वहां
हमेशा ट्रैफिक के विपरीत दिशा में चलना चाहिए। भारत में भी ट्रैफिक विशेषज्ञ, अदालतें और रोड
सेफ्टी कमेटियां यही मानती हैं कि पैदल यात्रियों की सुरक्षा का सबसे बुनियादी नियम यही है। इसके
बावजूद आम लोगों में भ्रम बना हुआ है। शायद इसलिए क्योंकि हमने इसे कभी गंभीरता से अपनाया
ही नहीं। हमें लगता है कि यह केवल कागजी नियम हैं, लेकिन जब हादसा होता है तब यही नियम
जीवन और मृत्यु के बीच फर्क बन जाते हैं।
यह सिर्फ सुरक्षा का सवाल नहीं है, यह कानूनी और आर्थिक पहलू से भी जुड़ा है। अगर कोई पैदल
यात्री गलत साइड चलते हुए दुर्घटना का शिकार होता है, तो उसे आंशिक रूप से अपनी लापरवाही का
जिम्मेदार माना जा सकता है। कई मामलों में मुआवजा या बीमा क्लेम कम कर दिया जाता है।
इसका मतलब यह हुआ कि गलत दिशा में चलना न केवल जान जोखिम में डालता है, बल्कि
दुर्घटना के बाद न्याय और आर्थिक सहायता की राह भी मुश्किल बना देता है। सड़क पर सही चलना
अब सिर्फ समझदारी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है।
समस्या यह नहीं कि नियम मौजूद नहीं हैं, समस्या यह है कि हम उन्हें आदत में नहीं ढाल पाए हैं।
बचपन से जो सीख मिली, वही हमारी चाल में बस गई। सड़क पार करते समय तो हम दाएं-बाएं
देखते हैं, लेकिन चलते समय सोचते ही नहीं कि किस तरफ चल रहे हैं। आदतें रातों-रात नहीं
बदलतीं। इसके लिए अभ्यास चाहिए, खुद को याद दिलाना पड़ता है। शुरुआत में अजीब लगेगा, लोग
टोकेंगे भी, लेकिन हर सही आदत की शुरुआत थोड़ी असहज होती है। जब हेलमेट पहनना अनिवार्य
हुआ था, तब भी लोगों को अटपटा लगा था। आज वही हेलमेट जान बचाने का सबसे बड़ा साधन है।
दाईं ओर चलने की आदत भी धीरे-धीरे उतनी ही स्वाभाविक हो सकती है।
इसके लिए सिर्फ सरकार या पुलिस को दोष देना आसान है, लेकिन समाधान हमारे हाथ में भी है।
जब हम खुद सही चलेंगे, तभी बच्चे देखकर सीखेंगे। आज जो बच्चा अपने माता-पिता के साथ सड़क
पर चलता है, वही कल का पैदल यात्री होगा। अगर वह हमें गलत साइड चलते देखेगा, तो वही
सीखेगा। सड़क सुरक्षा का सबसे मजबूत पाठ स्कूलों और किताबों से पहले व्यवहार से आता है। घर
से निकलते समय अगर हम खुद को यह याद दिला लें कि आज मुझे दाईं ओर चलना है, तो यह
छोटी-सी सोच बड़ी सुरक्षा बन सकती है।
शहरों में फुटपाथों की कमी एक सच्चाई है। हर जगह तुरंत बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर बन जाए, यह संभव
नहीं। ऐसे में पैदल यात्रियों के पास खुद को सुरक्षित रखने का सबसे सरल उपाय यही है कि वे सही
दिशा में चलें। यह नियम किसी एक राज्य या शहर तक सीमित नहीं है। अलग-अलग राज्यों की
ट्रैफिक गाइडलाइंस और अदालतों के फैसले इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं। संदेश साफ है कि
जहां पैदल चलने की अलग व्यवस्था नहीं है, वहां दाईं ओर चलना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है।
अक्सर लोग कहते हैं कि हमें नियम पता ही नहीं था। लेकिन जानकारी का अभाव अब बहाना नहीं
रह गया है। अखबार, सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में यह मुद्दा सामने आ चुका है। अब
सवाल यह नहीं कि नियम क्या है, सवाल यह है कि क्या हम उसे अपनाने को तैयार हैं। सड़क पर
चलते हुए एक कदम दाईं ओर ले जाना मुश्किल नहीं है। मुश्किल है अपनी पुरानी आदत को छोड़ना।
लेकिन अगर इस बदलाव से किसी की जान बच सकती है, तो यह मेहनत बहुत छोटी है।
सड़कें साझा जगह हैं। वहां वाहन चालक, पैदल यात्री, साइकिल सवार सभी एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
सुरक्षा तभी संभव है जब हर कोई अपनी भूमिका समझे। वाहन चालकों को सतर्क रहना होगा, लेकिन
पैदल यात्रियों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। सही दिशा में चलना उसी जिम्मेदारी का पहला
कदम है। यह न तो डर का नियम है और न ही सजा का, यह जीवन का नियम है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि सही दिशा में चलना कोई बड़ा बलिदान नहीं मांगता। यह बस
थोड़ी-सी जागरूकता, थोड़ी-सी प्रैक्टिस और थोड़े-से धैर्य की मांग करता है। अगर हम आज से यह
तय कर लें कि जहां फुटपाथ नहीं है, वहां हम दाईं ओर चलेंगे, तो शायद कल किसी परिवार को
अपनों को खोने का दुख न झेलना पड़े। जान बचाने के लिए दिशा बदलनी पड़े, तो इसमें कोई
ऐतराज नहीं होना चाहिए। अब देर किस बात की है, आइए सही दिशा में चलने की आदत डालें और
सड़क को थोड़ा और सुरक्षित बनाएं।












