बिहार में इस बार का विधानसभा चुनाव बेहद रोचक मोड़ पर आकर ठहर गया है। मतदान संपन्न हो चुका है और अब पूरे राज्य की निगाहें परिणामों पर टिकी हैं। हर वर्ग के मतदाता यह देखने को उत्सुक हैं कि जनता ने इस बार किसे सत्ता की चाबी सौंपी है—विकास के नाम पर वोट मांगने वाले एनडीए को या जन-कल्याण और रोजगार के वादों से जनता को आकर्षित करने वाले महागठबंधन को।
इस बार के चुनाव में मुफ्त वादों और तीखे आरोप-प्रत्यारोप की भरमार रही। दोनों गठबंधनों ने जनता को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। महागठबंधन ने युवाओं के लिए 10 लाख नौकरियों का वादा कर चुनावी मैदान में बड़ा दांव खेला, वहीं एनडीए ने अपने विकसित बिहार के मॉडल को जनता के सामने रखा। बीजेपी और जदयू ने इस चुनाव में “जंगलराज” की याद दिलाते हुए जनता से स्थिरता और सुरक्षा के नाम पर वोट मांगा।
दूसरी ओर, तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन ने बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा। चुनाव प्रचार के दौरान तेजस्वी यादव ने लगातार कहा कि बिहार को अब एक नई दिशा और नई सोच की जरूरत है। उन्होंने सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता और युवाओं को स्थायी रोजगार देने की बात कही। वहीं कांग्रेस और वामदलों ने सामाजिक न्याय और गरीबों के अधिकारों को अपनी प्राथमिकता बताया।
एनडीए ने विकास के एजेंडे को आगे रखा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी जनसभाओं में लगातार यह दोहराया कि उनके कार्यकाल में बिहार में सड़कों, बिजली और शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधार हुआ है। बीजेपी के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाओं का हवाला देकर कहा कि बिहार में केंद्र और राज्य के संयुक्त प्रयासों से विकास की रफ्तार बढ़ी है। एनडीए का प्रचार अभियान विकास और सुरक्षा के नारे पर टिका रहा, जिसमें युवाओं को तकनीकी शिक्षा और महिलाओं की सुरक्षा पर विशेष जोर दिया गया।
इस चुनाव की एक बड़ी खासियत यह रही कि दोनों गठबंधनों ने जातीय समीकरणों को तोड़ने की कोशिश की। महागठबंधन ने दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग को साथ लाने की रणनीति अपनाई, वहीं एनडीए ने महिलाओं और प्रथम मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए विशेष अभियान चलाए। इस बार मतदाता सूची में युवाओं की बड़ी हिस्सेदारी रही, जिससे चुनाव का रुख काफी हद तक प्रभावित हो सकता है।
चुनाव प्रचार में सोशल मीडिया का प्रभाव भी पहले से कहीं अधिक नजर आया। नेताओं ने रैलियों के साथ-साथ ऑनलाइन अभियानों के जरिये भी जनता तक अपनी बात पहुंचाई। महागठबंधन ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रोजगार और शिक्षा से जुड़े संदेश दिए, जबकि एनडीए ने डबल इंजन सरकार के लाभ गिनाए।
अब जब चुनाव परिणाम का इंतजार है, तो बिहार में हर वर्ग के बीच उत्सुकता बढ़ी हुई है। कुछ लोग इसे बदलाव का चुनाव मान रहे हैं, तो कुछ स्थिर शासन के समर्थन में हैं। यह तय है कि इस बार का जनादेश न केवल राज्य की राजनीति बल्कि आने वाले वर्षों में बिहार की दिशा भी तय करेगा।
अंततः बिहार की जनता ने मतदान के जरिये अपना फैसला दे दिया है, अब बस नजरें चुनाव आयोग की घोषणा पर हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि मुफ्त वादों और विकास के बीच जनता ने किस पर भरोसा जताया — जन-कल्याण की राजनीति पर या स्थिरता और सुरक्षा के वादे पर। परिणाम चाहे जो भी हो, इस बार का बिहार चुनाव यह साबित कर गया कि राज्य की जनता अब पहले से अधिक जागरूक, समझदार और अपने भविष्य को लेकर निर्णायक हो चुकी है।












