शहर में शिफ्टिंग और विकास कार्यों के नाम पर की जा रही पेड़ों की कटाई के मामले को गंभीरता से लेते हुए उच्च न्यायालय की युगलपीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी चिंताओं को प्राथमिकता देते हुए पश्चिमी-मध्य रेलवे ज़ोन के महाप्रबंधक, नगर निगम आयुक्त सहित कुल नौ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के आदेश दिए हैं। युगलपीठ ने स्पष्ट किया कि बिना उचित अनुमति और ठोस तर्क के पेड़ों को काटना न केवल पर्यावरणीय संतुलन के लिए खतरा है, बल्कि यह नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का भी उल्लंघन है।
मामले की सुनवाई के दौरान युगलपीठ ने अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों और दस्तावेज़ों पर असंतोष व्यक्त किया। अदालत ने कहा कि विकास कार्य महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी आड़ में पेड़ों को अंधाधुंध काटने की अनुमति नहीं दी जा सकती। न्यायालय के अनुसार, शहर में हरित क्षेत्र पहले से ही सीमित है, ऐसे में बिना वैकल्पिक व्यवस्था या पुनर्वनीकरण की योजना के पुराने और बड़े पेड़ों को काटने का निर्णय बेहद चिंताजनक है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि रेलवे और नगर निगम की संयुक्त शिफ्टिंग योजनाओं के तहत कई महत्वपूर्ण स्थानों पर पेड़ों को हटाने की तैयारी की जा रही है, जबकि इन पेड़ों के संरक्षण के लिए वैधानिक प्रावधानों का पालन नहीं किया जा रहा। याचिका में यह भी कहा गया कि संबंधित विभागों ने न तो सार्वजनिक सुनवाई की, न ही पर्यावरणीय प्रभाव के आकलन को प्राथमिकता दी, जिससे आम लोगों में रोष है।
अदालत ने इस पूरे मामले में अधिकारियों से यह पूछा है कि पेड़ों को काटने के लिए किस स्तर की मंजूरी ली गई और क्या वैकल्पिक उपायों पर विचार किया गया। युगलपीठ ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि अगली सुनवाई में संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो अदालत सख्त कार्रवाई करने में संकोच नहीं करेगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शहरी विकास पर्यावरण को नष्ट करके नहीं किया जा सकता और प्रत्येक विभाग की जिम्मेदारी है कि वह हरित संपदा की रक्षा सुनिश्चित करे।
सुनवाई के दौरान अदालत ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि अगली तारीख पर विस्तृत रिपोर्ट, दस्तावेज़, अनुमति पत्र तथा पुनर्वनीकरण की प्रस्तावित योजनाओं की जानकारी प्रस्तुत की जाए। अदालत ने यह भी कहा कि शहर के नागरिक साफ हवा और स्वस्थ पर्यावरण के हकदार हैं और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई इस अधिकार का हनन है।
मामले की अगली सुनवाई निर्धारित तिथि पर की जाएगी, जिसमें सभी तलब किए गए अधिकारी व्यक्तिगत रूप से मौजूद रहेंगे। अदालत का यह कड़ा कदम पर्यावरण संरक्षण के प्रति बढ़ती जागरूकता और न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।












