वेनेजुएला की मशहूर प्रतिपक्षी नेता मारिया कोरीना माचाडो को 2025 में नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया है। यह पुरस्कार उन्हें उस साहस, दृढ़ता व लोकतांत्रिक लड़ाई के लिए दिया गया, जो उन्होंने वेनेजुएला में अत्यधिक राजनीतिक दबाव और खतरों के बावजूद जारी रखी।
नोबेल समिति ने कहा है कि माचाडो “लोकतांत्रिक अधिकारों को बढ़ावा देने” और “अन्यायपूर्ण तानाशाही से शांतिपूर्ण संक्रमण की लड़ाई” में उनकी भूमिका को देखते हुए यह सम्मान दिया गया। वेनेजुएला में Nicolás Maduro के शासन के दौरान, माचाडो कई बार सत्ता विरोधी प्रतिबंधों, तमाम सार्वजनिक पदों से अयोग्य घोषित किए जाने, और व्यक्तिगत सुरक्षा खतरों का सामना करती रही हैं।
चूंकि माचाडो को सार्वजनिक पद वाले दावों के लिए अयोग्य घोषित किया गया था, इसलिए वे 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार नहीं बन पाईं। इसके बावजूद उन्होंने प्रतिपक्ष के अन्य नेताओं का समर्थन किया और लोकतांत्रिक बहुलता की लड़ाई का नेतृत्व जारी रखा।
इसमें एक महत्वपूर्ण राजनीतिक आयाम यह है कि इस वर्ष अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी सार्वजनिक रूप से नोबेल शांति पुरस्कार की उम्मीद जगाई थी। ट्रम्प ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय विवादों में मध्यस्थता के दावों के आधार पर यह पुरस्कार पाने की इच्छा जाहिर की थी।
हालाँकि, नोबेल समिति ने स्पष्ट किया कि उन्होंने ट्रम्प के दबाव या सार्वजनिक प्रचार से प्रभावित नहीं होकर निर्णायक रूप से माचाडो को ही यह पुरस्कार दिया। उनके निर्णय में “अल्फ्रेड नोबेल की मंशा और मूल आदर्श” सर्वोपरि रहे।
ट्रम्प समर्थकों और स्वयं ट्रम्प के लिए, यह निर्णय एक बड़ा झटका सिद्ध हुआ — उनकी उम्मीदों पर पाड़ लग गई। यह पल राजनीतिक रूप से भी प्रतीकात्मक है, क्योंकि ट्रम्प ने अक्सर अमेरिकी राजनयिक उपलब्धियों को आधार बनाकर इस पुरस्कार की मांग की थी।
समग्र रूप से, इस नोबेल पुरस्कार से माचाडो न केवल वेनेजुएला में बल्कि दुनिया भर में लोकतंत्र और मानवाधिकार की आवाज़ बन गई हैं। और ट्रम्प की शीर्ष स्तर की उम्मीदों को निराशा मिली है ,उनकी शांति-राष्ट्रपति की छवि को इस बार नोबेल कमेटी ने अनदेखा कर दिया।











