हाल ही में बागेश्वर धाम से शुरू हुई धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री द्वारा आयोजित ‘सनातन एकता पदयात्रा’ में बड़े पैमाने पर सामाजिक एवं धार्मिक जागरूकता का माहौल देखने को मिला। इस पदयात्रा में विशेष रूप से शामिल हुए प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास, जिन्होंने इस मौके पर कहा कि भारत में सभी भारतीयों के लिए एकता का सपना होना चाहिए , चाहे वे किसी भी धर्म, आस्था या पंथ से जुड़े हों।
धीरेंद्र शास्त्री ने अपनी पदयात्रा के दौरान बार-बार यह सन्देश दिया कि धर्म और आस्था-भेदों पर विजय पाकर हमें एक बड़ा सामाजिक बुनियाड़ी ढाँचा तैयार करना है। उन्होंने आगामी पथ में चलने वाले श्रद्धालुओं व नागरिकों से सामाजिक संवेदनशीलता, साझा आस्था और सांस्कृतिक एकजुटता की अपील की। इस दौरान कुमार विश्वास ने कहा कि उन्हें इस पदयात्रा में शामिल होने का निमंत्रण बाबा बागेश्वर ने स्वयं दिया था।
कुमार विश्वास ने अपने वक्तव्य में यह भी जोड़ा कि भारत न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी विविधताओं का देश है, और इसलिए भारत में भारतीयों के लिए एकता का सपना ही सही मार्ग है। उन्होंने कहा कि समाज में कहीं भी विभाजन के बीज पड़ेंगे तो यह राष्ट्र-बोध कमजोर होगा , इसलिए हमें व्यक्तिगत, सामाजिक और मानसिक रूप से एक हिंदुस्तानी पहचान को आगे बढ़ाना चाहिए।
इस पदयात्रा का न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक अर्थ भी है। यात्रा ७ नवंबर २०२५ से दिल्ली के छतरपुर स्थित आद्या कात्यायनी मंदिर से आरंभ हुई है और करीब १६ नवंबर को ब्रज क्षेत्र के वृंदावन में समापन होगा। कुल लगभग १० दिन व १७० किलोमीटर का यह मार्ग तय किया गया है। यात्रियों की भारी भागीदारी के चलते प्रशासन ने सुरक्षा व ट्रैफिक नियंत्रण की विस्तृत तैयारियाँ की हैं।
इस समवेत कार्यक्रम में कुमार विश्वास की मौजूदगी ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया , कवि-वक्ता होने के साथ एक सामाजिक चेतना के रूप में उनका मानना है कि धर्म, भाषा, रंग या क्षेत्र से परे हमें एक जुट होकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि हम भारत में विभिन्नताओं को स्वीकारकर एक साझा विचारधारा व भावना नहीं बनाएँगे, तो सामाजिक दूरी व असहमति बढ़ती रहेगी।
इस अवसर पर पदयात्रा के आयोजक ने यह स्पष्ट किया कि उद्देश्य केवल धार्मिक एकता नहीं बल्कि सनातन संस्कारों व समग्र भारतीयता को पुनर्जीवित करना भी है। उन्होंने यह कहा कि जब तक हम आस्था-भेदों को पार नहीं करेंगे, तब तक देश की संप्रभुता-भावना, सामाजिक सौहार्द और साझा पहचान पूरी तरह से स्थापित नहीं हो सकती।
इसलिए इस कार्यक्रम का मूल संदेश ध्यान देने योग्य है भारत में विविधता है, लेकिन भारतीयों के लिए सबसे बड़े लक्ष्य में से एक होना चाहिए: साझा एकता। चाहे धर्म कोई हो, आस्था कोई हो, समाज में जुनून और भरोसे का माहौल तभी पनपेगा जब हम मैं भारतीय हूँ वाली भावना को आगे लाएँगे। इस पदयात्रा ने ठीक यही दिशा-निर्देश दिए हैं: मिलन-भाव, सहयोग, और सार्वभौमिक पहचान की ओर।
इस प्रकार, बागेश्वर धाम की इस पदयात्रा ने न सिर्फ एक धार्मिक आयोजन के रूप में बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में भी स्वर लिया है। जिसमें कुमार विश्वास जैसे नाम ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया और अपने शब्दों द्वारा एकता-विचार को उद्घाटित किया। आने वाले समय में ऐसे प्रयास यह संकेत देते हैं कि जब व्यक्तित्व, कला व आस्था मिलकर एक साझा संदेश दें , तब ही वास्तव में विविधताओं वाला भारत अपने अंदर बसे एक भारत-भाव को जीवंत कर सकता है।












