भारत में शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की सबसे मज़बूत नींव माना जाता है। बार-बार यह कहा जाता है कि
बच्चे ही देश का भविष्य हैं और उनके विकास में किया गया निवेश ही सच्चा विकास है। लेकिन जब
हम सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले करोड़ों बच्चों के लिए प्रति विद्यार्थी प्रतिदिन मात्र ₹6.78 (प्राइमरी)
और ₹10.17 (अपर प्राइमरी) की कुकिंग कॉस्ट पर नज़र डालते हैं, तो यह आदर्शवाद कठोर यथार्थ से
टकराता हुआ दिखाई देता है।
स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है—क्या वाकई इतने पैसों में बच्चों को पौष्टिक, पर्याप्त और
सम्मानजनक भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है, या फिर हम अनजाने में बच्चों के भविष्य के साथ
एक सामूहिक मज़ाक कर रहे हैं?
मध्याह्न भोजन योजना भारत की सबसे महत्वाकांक्षी और प्रभावशाली सामाजिक योजनाओं में से एक
रही है। इसका उद्देश्य केवल बच्चों की भूख मिटाना नहीं था, बल्कि कुपोषण से लड़ना, विद्यालयों में
उपस्थिति बढ़ाना और सामाजिक समानता को बढ़ावा देना भी था। विशेष रूप से गरीब, दलित, आदिवासी
और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए यह योजना कई बार दिन का एकमात्र सुनिश्चित भोजन बन जाती है।
ऐसे में इस योजना के लिए तय की गई लागत का यथार्थवादी, संवेदनशील और मानवीय होना अत्यंत
आवश्यक है।
आज का आर्थिक परिदृश्य किसी से छिपा नहीं है। महंगाई लगातार बढ़ रही है। सब्ज़ियों के दाम रोज़
बदलते हैं, दालें और तेल आम आदमी की थाली से दूर होते जा रहे हैं, गैस सिलेंडर की कीमत हर घर
को परेशान कर रही है और दूध जैसी बुनियादी पोषण सामग्री भी लगातार महंगी हो रही है। ऐसे में यह
मान लेना कि कुछ ही रुपयों में एक बच्चे के लिए संतुलित और गुणवत्तापूर्ण भोजन तैयार किया जा
सकता है, जमीनी सच्चाई से कोसों दूर प्रतीत होता है।
सरकारी आदेशों और दिशा-निर्देशों में कुकिंग कॉस्ट का जो विभाजन दिखाया जाता है, वह काग़ज़ पर
भले ही संतुलित लगे, लेकिन व्यवहार में यह लगभग असंभव चुनौती बन जाता है। सब्ज़ी, दाल, दूध,
मसाले, तेल, गैस और अन्य आवश्यक खर्चों को जोड़ दिया जाए, तो तय राशि कई बार पहले ही दिन
समाप्त हो जाती है। परिणामस्वरूप विद्यालयों को या तो भोजन की गुणवत्ता से समझौता करना पड़ता
है, या मात्रा से—और कई बार दोनों से।
इसका सबसे बड़ा नुकसान बच्चों को उठाना पड़ता है। भोजन में विविधता की कमी, पोषक तत्वों का
अभाव और स्वादहीनता बच्चों की रुचि को भी प्रभावित करती है। कई बच्चे भोजन पूरा नहीं करते, कुछ
की स्कूल में उपस्थिति कम होने लगती है और कुछ धीरे-धीरे पढ़ाई से भी कटने लगते हैं। यह प्रभाव
तुरंत आँकड़ों में नहीं दिखता, लेकिन लंबे समय में यह बच्चों की सीखने की क्षमता, स्वास्थ्य और
आत्मविश्वास को गहराई से प्रभावित करता है।
इस पूरी व्यवस्था का एक और अक्सर अनदेखा किया जाने वाला पहलू है—रसोइये और विद्यालय स्टाफ।
बेहद कम मानदेय में काम करने वाले रसोइयों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे हर दिन सैकड़ों बच्चों
के लिए गुणवत्तापूर्ण भोजन तैयार करें। कई बार उन्हें स्थानीय स्तर पर उधार लेना पड़ता है, अपनी जेब
से खर्च करना पड़ता है या फिर शिकायतों और आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति न
केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि योजना की मूल भावना के भी विरुद्ध है।
विडंबना यह है कि एक ओर हम “सुपोषित भारत”, “नई शिक्षा नीति” और “मानव संसाधन विकास”
जैसे बड़े-बड़े शब्दों का प्रयोग करते हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों के भोजन के लिए बजट तय करते समय
अत्यधिक कंजूसी दिखाई देती है। क्या यह स्पष्ट विरोधाभास नहीं है? क्या हम सचमुच मानते हैं कि
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण पोषण के बिना संभव है?
शोध और अनुभव—दोनों ही यह सिद्ध करते हैं कि शिक्षा और पोषण का गहरा संबंध है। भूखा या
कुपोषित बच्चा न तो ध्यान केंद्रित कर सकता है और न ही सीखने में रुचि ले सकता है। यदि मध्याह्न
भोजन योजना कमजोर होगी, तो उसका सीधा असर सीखने के स्तर, उपस्थिति और ड्रॉपआउट दर पर
पड़ेगा। यह केवल एक कल्याणकारी योजना का प्रश्न नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय विकास और सामाजिक न्याय
का मुद्दा है।
एक और गंभीर समस्या यह है कि कुकिंग कॉस्ट का निर्धारण अक्सर एकरूपता के आधार पर किया
जाता है, जबकि देश के अलग-अलग हिस्सों में महंगाई और बाजार दरें अलग-अलग हैं। ग्रामीण और
शहरी क्षेत्रों में लागत का अंतर स्पष्ट है, फिर भी तय राशि लगभग समान रहती है। इससे कई क्षेत्रों में
विद्यालयों के लिए इस योजना को प्रभावी ढंग से लागू करना और भी कठिन हो जाता है।
समय की मांग है कि सरकारें इस विषय को केवल प्रशासनिक औपचारिकता के रूप में न देखें, बल्कि
इसे नैतिक और मानवीय जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करें। कुकिंग कॉस्ट का नियमित और स्वचालित
पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए, जिसे महंगाई दर और स्थानीय बाजार मूल्यों से जोड़ा जाए। साथ ही
निगरानी व्यवस्था को मज़बूत किया जाए, ताकि बढ़ी हुई राशि वास्तव में बच्चों के भोजन पर ही खर्च
हो।
यह भी आवश्यक है कि ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले शिक्षकों, प्रधानाध्यापकों और रसोइयों की
आवाज़ को नीति-निर्धारण की प्रक्रिया में शामिल किया जाए। वे रोज़ इस व्यवस्था की वास्तविक
चुनौतियों का सामना करते हैं और उनके अनुभव किसी भी फाइल नोटिंग से कहीं अधिक मूल्यवान हैं।
सरकारों को यह समझना होगा कि मध्याह्न भोजन योजना कोई बोझ नहीं, बल्कि भविष्य में किया गया
निवेश है। आज अगर बच्चों की थाली मजबूत होगी, तो कल देश की अर्थव्यवस्था, समाज और लोकतंत्र
भी मजबूत होंगे। लेकिन यदि हम आज भी बच्चों के भोजन को खर्च समझकर न्यूनतम बजट में चलाने
की सोच रखते हैं, तो इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ेंगे।
अंततः प्रश्न वही है—क्या ₹6.78 या ₹10.17 में बच्चों का पोषण वास्तव में संभव है, या यह केवल
आंकड़ों का खेल बनकर रह गया है? अब भी समय है कि नीति-निर्माता इस सच्चाई को स्वीकार करें
और साहसिक निर्णय लें। क्योंकि यह बहस केवल भोजन की नहीं है— यह बच्चों के सम्मान, स्वास्थ्य
और देश के भविष्य की है।












