नीतीश कुमार चुनाव से ठीक पहले अचानक जिस तरह सक्रिय हुए, उसने बिहार की राजनीति में नया समीकरण पैदा कर दिया। लंबे समय से शांत और सीमित जनसंपर्क तक सीमित दिखने वाले नीतीश कुमार ने जैसे ही चुनावी रणभेरी बजने से पहले मोर्चा संभाला, पूरे राजनीतिक माहौल में हलचल मच गई। खास बात यह रही कि उन्होंने टिकट वितरण से लेकर सीट बंटवारे तक हर चरण में अपना राजनीतिक कौशल और अनुभव बेझिझक दिखाया। जेडीयू के भीतर और एनडीए सहयोगियों के बीच कई बार माथापच्ची की स्थिति बनी, लेकिन नीतीश ने अपने तरीके से फैसले करवाए और अंततः वही सीट फार्मूला लागू हुआ, जिसे वे सही मानते थे।
टिकट बंटवारे के बाद नीतीश अचानक चुनावी मैदान में उतरे और उन्होंने बैक टू बैक 81 रैलियों का रिकॉर्ड बनाया। उम्र के इस पड़ाव पर इतनी तेज़ी से अभियान चलाना न सिर्फ कार्यकर्ताओं के लिए उत्साहजनक था, बल्कि विपक्ष के लिए भी चुनौतीपूर्ण। उनकी हर रैली में भीड़ नजर आई, और उनका फोकस पूरी तरह तीन प्रमुख वोट बैंक पर था—महिला मतदाता, मुस्लिम समाज और अति पिछड़ा वर्ग। नीतीश वर्षों से इन समुदायों के भरोसे पर अपनी राजनीति टिकाए हुए हैं, और इस चुनाव में उन्होंने इन्हें फिर मजबूती से साधा।
महिलाओं के बीच नीतीश की लोकप्रियता पहले से ही शराबबंदी, जीविका दीदी योजना, साइकिल योजना और पढ़ाई-लिखाई से जुड़ी कई योजनाओं की वजह से मजबूत थी। इस बार भी उन्होंने हर मंच से महिलाओं को आत्मनिर्भरता और सुरक्षा का भरोसा दिया। मुस्लिम वोटरों के बीच उन्होंने शांतिपूर्ण प्रशासन और सामाजिक सौहार्द का संदेश दिया, जिससे यह वर्ग फिर उनके पीछे एकजुट होता दिखाई दिया। वहीं अति पिछड़े वर्गों के लिए आकांक्षी योजनाओं और सामाजिक प्रतिनिधित्व को प्रमुख मुद्दा बनाकर उन्होंने अपना परंपरागत आधार मजबूती से दोबारा खड़ा किया।
इन तीनों वोट समूहों का असर सीधे सीटों पर देखने को मिला। शुरुआती राजनीतिक गणित में जो सीटें जेडीयू के लिए मुश्किल मानी जा रही थीं, वे भी इस बार उनके खाते में comfortably जाती दिखीं। पार्टी की जीत की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी ने यह साबित किया कि नीतीश की रणनीति और आखिरी समय का एक्टिव होना पूरी तरह चुनावी परिणामों को प्रभावित करने में सफल रहा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि लगभग 15 साल बाद नीतीश कुमार की पार्टी फिर से ‘पावरफुल’ स्थिति में पहुंच गई। गठबंधन राजनीति में अक्सर जेडीयू को समीकरणों के सहारे चलना पड़ता था, लेकिन इस बार सीटों की संख्या बढ़ने के साथ वह मजबूत और निर्णायक भूमिका में आ गई। एनडीए के भीतर भी जेडीयू की स्थिति पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली नजर आ रही है।
कुल मिलाकर, नीतीश कुमार का अचानक एक्टिव होना, रणनीतिक टिकट वितरण और आक्रामक चुनावी प्रचार , इन तीनों ने मिलकर उन्हें एक बार फिर बिहार की राजनीति के केंद्र में पहुंचा दिया है।












