नई दिल्ली, 16 फरवरी ब्रिटेन स्थित शिक्षाविद अमृत विल्सन के ओवरसीज सिटीजन
ऑफ इंडिया कार्ड रद्द किए जाने के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा कि
देश को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बदनाम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार
कौरव की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से दाखिल सीलबंद रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद यह
टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि खुफिया रिपोर्ट में अमृत विल्सन पर भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने
के आरोप लगाए गए हैं। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि देश को लेकर असहिष्णुता की सीमा
इतनी नहीं हो सकती कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी छवि को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों
की अनुमति दी जाए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल सामाजिक माध्यमों पर की
गई टिप्पणियों तक सीमित नहीं है, बल्कि खुफिया रिपोर्ट में गंभीर आरोपों का उल्लेख किया गया है।
82 वर्षीय अमृत विल्सन ने वर्ष 2023 में अपना ओसीआई कार्ड रद्द किए जाने के आदेश को
चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। उन्होंने इसे अवैध, मनमाना और बिना पर्याप्त कारणों के
लिया गया निर्णय बताया है। अदालत ने इस याचिका पर मई 2023 में केंद्र सरकार को नोटिस जारी
किया था।
सुनवाई के दौरान अमृत विल्सन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता त्रिदीप पेस ने तर्क दिया कि कारण
बताओ नोटिस में विस्तृत जानकारी नहीं दी गई थी और सरकार ने केवल एक सामाजिक माध्यम
पोस्ट तथा किसानों के आंदोलन और कश्मीर पर लिखे गए लेख का उल्लेख किया है। वहीं केंद्र
सरकार की ओर से अधिवक्ता निधि रमन ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध सामग्री
याचिकाकर्ता को उपलब्ध करा दी गई है, जबकि सुरक्षा एजेंसियों से प्राप्त कुछ संवेदनशील सूचनाएं
सीलबंद लिफाफे में अदालत को सौंपी गई हैं।
मामले की अगली सुनवाई में न्यायालय दोनों पक्षों के तर्कों पर विस्तृत विचार करेगा। यह मामला
ओसीआई कार्ड रद्द करने की प्रक्रिया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन
से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को भी सामने ला रहा है।












