1919 फरवरी भारत के इतिहास का वह गौरवपूर्ण दिवस है, जब हम छत्रपति शिवाजी महाराज की
जयंती मनाते हैं। यह केवल एक जन्मतिथि का स्मरण नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता, स्वाभिमान
और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के उस अद्भुत अध्याय का उत्सव है, जिसने पराधीनता के अंधकार में
स्वराज्य का दीप प्रज्वलित किया। सत्रहवीं शताब्दी में जब भारत का बड़ा भूभाग मुगल सत्ता,
विशेषतः औरंगजेब के कठोर शासन के अधीन था, तब सह्याद्रि की पर्वतमालाओं से एक युवा योद्धा
ने यह उद्घोष किया कि “हिंदवी स्वराज्य” केवल स्वप्न नहीं, बल्कि संकल्प है-और उस संकल्प को
साकार कर दिखाया।
शिवाजी महाराज का जन्म 1630 में शिवनेरी दुर्ग पर हुआ। उनका नाम भगवान शिव पर नहीं,
बल्कि देवी शिवई के नाम पर रखा गया-यह तथ्य ही बताता है कि उनके जीवन की प्रेरणा शक्ति
और साहस की आराधना में निहित थी। उनकी माता जीजाबाई ने उन्हें रामायण, महाभारत और
पुराणों की कथाओं के माध्यम से धर्म, नीति और राष्ट्रधर्म का संस्कार दिया। दादाजी कोंडदेव के
मार्गदर्शन में उन्होंने शास्त्र और शस्त्र दोनों का संतुलित ज्ञान प्राप्त किया। यही संतुलन आगे चलकर
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता बना-वे केवल तलवार के धनी नहीं, बल्कि नीति और
दूरदर्शिता के भी अद्वितीय उदाहरण थे।
शिवाजी महाराज का सबसे बड़ा योगदान हिंदू साम्राज्य की स्थापना है, जिसे उन्होंने “हिंदवी
स्वराज्य” कहा। यह किसी एक संप्रदाय का राज्य नहीं था, बल्कि भारतीय जनमानस की स्वतंत्रता
और सम्मान का प्रतीक था। उन्होंने छोटे-छोटे किलों से शुरुआत कर एक संगठित मराठा शक्ति का
निर्माण किया। तोरणा, रायगढ़, प्रतापगढ़ जैसे दुर्ग केवल पत्थरों की संरचनाएँ नहीं थे, बल्कि
स्वराज्य के प्रहरी थे। गुरिल्ला युद्धकला में उनकी दक्षता अद्भुत थी। मुगल सेनापति उन्हें “पहाड़ी
चूहा” कहकर उपहास करना चाहते थे, परंतु वही रणनीति मुगलों की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। वे
भूगोल को अपनी शक्ति में बदलने की कला जानते थे-तेजी से आक्रमण, अचानक प्रहार और सुरक्षित
वापसी उनकी युद्धनीति का आधार था।
उनकी वीरता का शिखर तब दिखाई देता है जब उन्होंने औरंगजेब की विशाल साम्राज्यवादी शक्ति को
खुली चुनौती दी। आगरा में बंदी बनाए जाने के बाद उनका साहसिक पलायन केवल एक व्यक्तिगत
उपलब्धि नहीं, बल्कि मुगल सत्ता के अहंकार पर करारा प्रहार था। इसके पश्चात उन्होंने 1674 में
रायगढ़ में विधिवत राज्याभिषेक कर स्वयं को “छत्रपति” घोषित किया। यह घटना केवल राजनीतिक
नहीं, सांस्कृतिक पुनस्र्थापन का भी प्रतीक थी-सदियों बाद किसी हिंदू राजा का वैदिक विधि से
राज्याभिषेक हुआ था।
शिवाजी महाराज की शासन व्यवस्था भी उतनी ही प्रभावशाली थी जितनी उनकी युद्धनीति। उन्होंने
अष्टप्रधान मंडल की स्थापना की, जिसमें विभिन्न विभागों के मंत्री नियुक्त थे। प्रशासन में
पारदर्शिता, न्याय और जनकल्याण को प्राथमिकता दी गई। भूमि राजस्व व्यवस्था को सुव्यवस्थित
किया गया ताकि किसानों पर अत्याचार न हो। महिलाओं के सम्मान की रक्षा उनके शासन का मूल
सिद्धांत था-युद्ध में पकड़ी गई महिलाओं को सम्मानपूर्वक उनके घर भेजने की परंपरा उन्होंने
स्थापित की। धार्मिक सहिष्णुता उनके शासन की आधारशिला थी, उनकी सेना और प्रशासन में
मुस्लिम अधिकारी भी महत्वपूर्ण पदों पर थे। उन्होंने किसी भी मस्जिद या पूजा स्थल को क्षति
पहुँचाने की अनुमति नहीं दी। इस प्रकार उनका हिंदू स्वराज्य संकीर्ण नहीं, बल्कि उदार और समावेशी
था।
शिवाजी महाराज भारत के उन शुरुआती शासकों में थे जिन्होंने समुद्री शक्ति के महत्व को समझा।
उन्होंने एक सशक्त नौसेना का निर्माण किया और कोंकण तट की सुरक्षा सुनिश्चित की। विदेशी
आक्रमणकारियों-विशेषतः पुर्तगालियों और सिद्धियोंकृके विरुद्ध यह रणनीति अत्यंत प्रभावी सिद्ध
हुई। यह दूरदर्शिता दर्शाती है कि वे केवल तत्कालीन संघर्षों तक सीमित नहीं थे, बल्कि भविष्य की
चुनौतियों को भी भांपने की क्षमता रखते थे।
भारतीय संस्कृति और अस्मिता के लिए उनका त्याग अतुलनीय है। उन्होंने विलासिता का जीवन
त्यागकर कठिन संघर्ष का मार्ग चुना। निरंतर युद्ध, षड्यंत्र और चुनौतियों के बीच भी उन्होंने
राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि रखा। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि स्वराज्य केवल राजनीतिक
स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान का भी प्रश्न है। उन्होंने जनमानस में यह विश्वास
जगाया कि विदेशी सत्ता अजेय नहीं है और संगठित प्रयास से स्वतंत्रता प्राप्त की जा सकती है।
आधुनिक संदर्भ में यदि हम इस विरासत को देखें, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आज के भारत में
शिवाजी के आदर्श कितने प्रासंगिक हैं। वर्तमान समय में जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका
सुदृढ़ कर रहा है, तब राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सुशासन की अवधारणाएँ पुनः केंद्र
में हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने आत्मनिर्भरता, सशक्त रक्षा नीति और सांस्कृतिक धरोहर के
संरक्षण पर विशेष बल दिया है। यहाँ तुलनात्मक विवेचना की जा सकती है, यद्यपि दोनों युगों की
परिस्थितियाँ भिन्न हैं।
शिवाजी महाराज ने स्वदेशी सैन्य शक्ति पर भरोसा किया और स्थानीय संसाधनों के माध्यम से
साम्राज्य खड़ा किया। आधुनिक भारत में आत्मनिर्भर भारत अभियान उसी भावना का आधुनिक रूप
प्रतीत होता है, जहाँ रक्षा उत्पादन और आर्थिक सशक्तिकरण पर बल दिया जा रहा है। शिवाजी ने
किलों और नौसेना के माध्यम से सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की, आज भारत आधुनिक तकनीक
और रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहा है।
शिवाजी का प्रशासन जनकल्याण और पारदर्शिता पर आधारित थाय समकालीन शासन में डिजिटल
पारदर्शिता, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और भ्रष्टाचार-नियंत्रण की पहलें उसी आदर्श की झलक देती हैं।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दृष्टि से भी समानता देखी जा सकती है। शिवाजी महाराज ने हिंदू
परंपराओं और प्रतीकों को पुनस्र्थापित कर जनमानस में आत्मगौरव जगाया। आज भी भारत में
सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण, तीर्थस्थलों के विकास और ऐतिहासिक विरासत के पुनरोद्धार पर बल
दिया जा रहा है। अंतर केवल इतना है कि शिवाजी का संघर्ष प्रत्यक्ष सैन्य टकराव का था, जबकि
आधुनिक भारत का संघर्ष वैश्विक प्रतिस्पर्धा और कूटनीतिक संतुलन का है।
फिर भी, तुलनात्मक विवेचना करते समय यह स्मरण रखना चाहिए कि शिवाजी महाराज का युग
पूर्णतः भिन्न राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों में था। वे एक उभरते हुए स्वराज्य के संस्थापक थे,
आज का भारत एक स्थापित लोकतांत्रिक गणराज्य है। अतः समानताओं को प्रेरणा के रूप में देखना
चाहिए, न कि पूर्ण समानता के रूप में। शिवाजी की सबसे बड़ी सीख है-साहस, संगठन, दूरदर्शिता
और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना। यही मूल्य किसी भी युग में प्रासंगिक रहते हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि राष्ट्र निर्माण केवल तलवार से
नहीं, बल्कि नीति, नैतिकता और जनविश्वास से होता है। उन्होंने दिखाया कि सीमित संसाधनों के
बावजूद यदि नेतृत्व दृढ़ हो तो असंभव भी संभव हो सकता है। आज आवश्यकता है कि हम उनके
आदर्शों को केवल उत्सव तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने आचरण और राष्ट्रीय जीवन में
उतारें। भारतीय अस्मिता का अर्थ किसी के प्रति द्वेष नहीं, बल्कि अपने स्वत्व का सम्मान है-और
यही संदेश शिवाजी महाराज के जीवन से हमें मिलता है। उनकी 394वीं जयंती पर उन्हें नमन करते
हुए हम संकल्प लें कि स्वराज्य की उस भावना को, जिसे उन्होंने सह्याद्रि की घाटियों से जगाया था,
हम आधुनिक भारत की प्रगति और वैश्विक नेतृत्व में रूपांतरित करेंगे। यही उनके प्रति सच्ची
श्रद्धांजलि होगी।
(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) फरवरी भारत के इतिहास का वह गौरवपूर्ण दिवस है, जब हम छत्रपति शिवाजी महाराज की
जयंती मनाते हैं। यह केवल एक जन्मतिथि का स्मरण नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता, स्वाभिमान
और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के उस अद्भुत अध्याय का उत्सव है, जिसने पराधीनता के अंधकार में
स्वराज्य का दीप प्रज्वलित किया। सत्रहवीं शताब्दी में जब भारत का बड़ा भूभाग मुगल सत्ता,
विशेषतः औरंगजेब के कठोर शासन के अधीन था, तब सह्याद्रि की पर्वतमालाओं से एक युवा योद्धा
ने यह उद्घोष किया कि “हिंदवी स्वराज्य” केवल स्वप्न नहीं, बल्कि संकल्प है-और उस संकल्प को
साकार कर दिखाया।
शिवाजी महाराज का जन्म 1630 में शिवनेरी दुर्ग पर हुआ। उनका नाम भगवान शिव पर नहीं,
बल्कि देवी शिवई के नाम पर रखा गया-यह तथ्य ही बताता है कि उनके जीवन की प्रेरणा शक्ति
और साहस की आराधना में निहित थी। उनकी माता जीजाबाई ने उन्हें रामायण, महाभारत और
पुराणों की कथाओं के माध्यम से धर्म, नीति और राष्ट्रधर्म का संस्कार दिया। दादाजी कोंडदेव के
मार्गदर्शन में उन्होंने शास्त्र और शस्त्र दोनों का संतुलित ज्ञान प्राप्त किया। यही संतुलन आगे चलकर
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता बना-वे केवल तलवार के धनी नहीं, बल्कि नीति और
दूरदर्शिता के भी अद्वितीय उदाहरण थे।
शिवाजी महाराज का सबसे बड़ा योगदान हिंदू साम्राज्य की स्थापना है, जिसे उन्होंने “हिंदवी
स्वराज्य” कहा। यह किसी एक संप्रदाय का राज्य नहीं था, बल्कि भारतीय जनमानस की स्वतंत्रता
और सम्मान का प्रतीक था। उन्होंने छोटे-छोटे किलों से शुरुआत कर एक संगठित मराठा शक्ति का
निर्माण किया। तोरणा, रायगढ़, प्रतापगढ़ जैसे दुर्ग केवल पत्थरों की संरचनाएँ नहीं थे, बल्कि
स्वराज्य के प्रहरी थे। गुरिल्ला युद्धकला में उनकी दक्षता अद्भुत थी। मुगल सेनापति उन्हें “पहाड़ी
चूहा” कहकर उपहास करना चाहते थे, परंतु वही रणनीति मुगलों की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। वे
भूगोल को अपनी शक्ति में बदलने की कला जानते थे-तेजी से आक्रमण, अचानक प्रहार और सुरक्षित
वापसी उनकी युद्धनीति का आधार था।
उनकी वीरता का शिखर तब दिखाई देता है जब उन्होंने औरंगजेब की विशाल साम्राज्यवादी शक्ति को
खुली चुनौती दी। आगरा में बंदी बनाए जाने के बाद उनका साहसिक पलायन केवल एक व्यक्तिगत
उपलब्धि नहीं, बल्कि मुगल सत्ता के अहंकार पर करारा प्रहार था। इसके पश्चात उन्होंने 1674 में
रायगढ़ में विधिवत राज्याभिषेक कर स्वयं को “छत्रपति” घोषित किया। यह घटना केवल राजनीतिक
नहीं, सांस्कृतिक पुनस्र्थापन का भी प्रतीक थी-सदियों बाद किसी हिंदू राजा का वैदिक विधि से
राज्याभिषेक हुआ था।
शिवाजी महाराज की शासन व्यवस्था भी उतनी ही प्रभावशाली थी जितनी उनकी युद्धनीति। उन्होंने
अष्टप्रधान मंडल की स्थापना की, जिसमें विभिन्न विभागों के मंत्री नियुक्त थे। प्रशासन में
पारदर्शिता, न्याय और जनकल्याण को प्राथमिकता दी गई। भूमि राजस्व व्यवस्था को सुव्यवस्थित
किया गया ताकि किसानों पर अत्याचार न हो। महिलाओं के सम्मान की रक्षा उनके शासन का मूल
सिद्धांत था-युद्ध में पकड़ी गई महिलाओं को सम्मानपूर्वक उनके घर भेजने की परंपरा उन्होंने
स्थापित की। धार्मिक सहिष्णुता उनके शासन की आधारशिला थी, उनकी सेना और प्रशासन में
मुस्लिम अधिकारी भी महत्वपूर्ण पदों पर थे। उन्होंने किसी भी मस्जिद या पूजा स्थल को क्षति
पहुँचाने की अनुमति नहीं दी। इस प्रकार उनका हिंदू स्वराज्य संकीर्ण नहीं, बल्कि उदार और समावेशी
था।
शिवाजी महाराज भारत के उन शुरुआती शासकों में थे जिन्होंने समुद्री शक्ति के महत्व को समझा।
उन्होंने एक सशक्त नौसेना का निर्माण किया और कोंकण तट की सुरक्षा सुनिश्चित की। विदेशी
आक्रमणकारियों-विशेषतः पुर्तगालियों और सिद्धियोंकृके विरुद्ध यह रणनीति अत्यंत प्रभावी सिद्ध
हुई। यह दूरदर्शिता दर्शाती है कि वे केवल तत्कालीन संघर्षों तक सीमित नहीं थे, बल्कि भविष्य की
चुनौतियों को भी भांपने की क्षमता रखते थे।
भारतीय संस्कृति और अस्मिता के लिए उनका त्याग अतुलनीय है। उन्होंने विलासिता का जीवन
त्यागकर कठिन संघर्ष का मार्ग चुना। निरंतर युद्ध, षड्यंत्र और चुनौतियों के बीच भी उन्होंने
राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि रखा। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि स्वराज्य केवल राजनीतिक
स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान का भी प्रश्न है। उन्होंने जनमानस में यह विश्वास
जगाया कि विदेशी सत्ता अजेय नहीं है और संगठित प्रयास से स्वतंत्रता प्राप्त की जा सकती है।
आधुनिक संदर्भ में यदि हम इस विरासत को देखें, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आज के भारत में
शिवाजी के आदर्श कितने प्रासंगिक हैं। वर्तमान समय में जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका
सुदृढ़ कर रहा है, तब राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सुशासन की अवधारणाएँ पुनः केंद्र
में हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने आत्मनिर्भरता, सशक्त रक्षा नीति और सांस्कृतिक धरोहर के
संरक्षण पर विशेष बल दिया है। यहाँ तुलनात्मक विवेचना की जा सकती है, यद्यपि दोनों युगों की
परिस्थितियाँ भिन्न हैं।
शिवाजी महाराज ने स्वदेशी सैन्य शक्ति पर भरोसा किया और स्थानीय संसाधनों के माध्यम से
साम्राज्य खड़ा किया। आधुनिक भारत में आत्मनिर्भर भारत अभियान उसी भावना का आधुनिक रूप
प्रतीत होता है, जहाँ रक्षा उत्पादन और आर्थिक सशक्तिकरण पर बल दिया जा रहा है। शिवाजी ने
किलों और नौसेना के माध्यम से सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की, आज भारत आधुनिक तकनीक
और रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहा है।
शिवाजी का प्रशासन जनकल्याण और पारदर्शिता पर आधारित थाय समकालीन शासन में डिजिटल
पारदर्शिता, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और भ्रष्टाचार-नियंत्रण की पहलें उसी आदर्श की झलक देती हैं।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दृष्टि से भी समानता देखी जा सकती है। शिवाजी महाराज ने हिंदू
परंपराओं और प्रतीकों को पुनस्र्थापित कर जनमानस में आत्मगौरव जगाया। आज भी भारत में
सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण, तीर्थस्थलों के विकास और ऐतिहासिक विरासत के पुनरोद्धार पर बल
दिया जा रहा है। अंतर केवल इतना है कि शिवाजी का संघर्ष प्रत्यक्ष सैन्य टकराव का था, जबकि
आधुनिक भारत का संघर्ष वैश्विक प्रतिस्पर्धा और कूटनीतिक संतुलन का है।
फिर भी, तुलनात्मक विवेचना करते समय यह स्मरण रखना चाहिए कि शिवाजी महाराज का युग
पूर्णतः भिन्न राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों में था। वे एक उभरते हुए स्वराज्य के संस्थापक थे,
आज का भारत एक स्थापित लोकतांत्रिक गणराज्य है। अतः समानताओं को प्रेरणा के रूप में देखना
चाहिए, न कि पूर्ण समानता के रूप में। शिवाजी की सबसे बड़ी सीख है-साहस, संगठन, दूरदर्शिता
और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना। यही मूल्य किसी भी युग में प्रासंगिक रहते हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि राष्ट्र निर्माण केवल तलवार से
नहीं, बल्कि नीति, नैतिकता और जनविश्वास से होता है। उन्होंने दिखाया कि सीमित संसाधनों के
बावजूद यदि नेतृत्व दृढ़ हो तो असंभव भी संभव हो सकता है। आज आवश्यकता है कि हम उनके
आदर्शों को केवल उत्सव तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने आचरण और राष्ट्रीय जीवन में
उतारें। भारतीय अस्मिता का अर्थ किसी के प्रति द्वेष नहीं, बल्कि अपने स्वत्व का सम्मान है-और
यही संदेश शिवाजी महाराज के जीवन से हमें मिलता है। उनकी 394वीं जयंती पर उन्हें नमन करते
हुए हम संकल्प लें कि स्वराज्य की उस भावना को, जिसे उन्होंने सह्याद्रि की घाटियों से जगाया था,
हम आधुनिक भारत की प्रगति और वैश्विक नेतृत्व में रूपांतरित करेंगे। यही उनके प्रति सच्ची
श्रद्धांजलि होगी।
(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है)












