मध्यप्रदेश सरकार में इन दिनों हर स्तर पर ‘‘कर्ज लो और घी पीयो’’ की तर्ज पर काम चलरहा है,
मध्यप्रदेश निर्माण के इस ‘‘हीरक जयंती वर्ष’’ में पहली बार राज्य के कुल बजट से अधिक कर्ज हो गया
है और जो नया कर्ज लेने की योजना तैयार की जा रही है, उसकी राशि कर्ज की किश्तें चुकानें में ही
जाना है। किंतु यहां अहम् सवाल यह कि इस आर्थिक संकट काल की चिंता किसे है? सरकार में मंत्री से
लेकर हर स्तर तक मौज-मस्ती का माहौल है, किसी को भी न कर्ज की बढ़ती राशि की चिंता है और न
ही उसे चुकाने की? फिर इसी संकट से जुड़ा अहम् सवाल यह भी है कि आखिर यह राशि खर्च कहां की
जा रही है। क्योंकि अपने खून-पसीने की कमाई करों के रूप में चुकान वाली प्रदेश की जनता तो उसी
‘फटे हाल’ स्थिति में है, जिसमें वह कई बरसों से है, उसका काम अब सिर्फ और सिर्फ करो का भुगतान
करना ही रह गया है, उसके बदले में उसे क्या सुविधाएं मिल रही है, इस पर चिंतन की फिक्र किसी को
भी नही है। मध्यप्रदेश का तो हालही में नए वित्तीय वर्ष का बजट आया है, उसमें बजट से अधिक कर्ज
की राशि दर्शाई गई है, बजट है 4 लाख 65 हजार करोड़ का और राज्य पर कर्ज है 5 लाख करोड़ से भी
अधिक और यह कर्ज राशि दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती ही जा रही है, अब नौबत यह आ गई है कि नया
कर्ज लेकर पुराना कर्ज चुकाया जाएगा।
अब प्रजातंत्र की इस ‘‘हीरक जयंती’’ पर यही गंभीर चिंतन का विषय है कि क्या गांधी-पटेल-नेहरू ने
इसी प्रजातंत्र की कल्पना की थी? आज सरकार से जुड़ा हर वर्ग मौज-मस्ती व भ्रष्टाचार में व्यस्त है
और देश का आम नागरिक अपने दो समय के भोजन की चिंता में है। अब यदि इसे ही ‘‘आदर्श प्रजातंत्र’’
की संज्ञा दी जा रही है, तो फिर सभी धन्य है।
अब तो स्थिति यह है कि देश के आम नागरिक को छोड़ शेष सभी मस्ती में है, सबसे अधिक मस्ती में
राजनेता और उनके राजनीतिक दल, जो राजनीतिक दल सत्तारूढ़ होता है, फिर चाहे वह कांग्रेस हो या
भाजपा और कोई उसकी आर्थिक आय की कोई सीमा नही होती, हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार
देश पर राज कर रही भारतीय जनता पार्टी को तीन हजार एक सौ सत्तावन करोड की राशि चंदे के रूप में
प्राप्त हुई, जो कांग्रेस को मिली चंदा राशि से अस्सी फीसदी से भी अधिक है। देश के चुनावी ट्रस्टों ने
राजनीतिक दलों को दिया, तीन हजार आठ से छब्बीस करोड से अधिक का चंदा।
इस प्रकार कुल मिलाकर यदि आर्थिक दृष्टिकोण से यही कहा जाए कि देश की राजनीतिक व उसे
संचालित करने वालों को छोड़ सभी गरीब है तो कतई गलत नही होगा।












