नजरिया: दृष्टिकोण का महत्व
हर व्यक्ति का अपना एक विशेष नजरिया होता है। यह नजरिया कभी दुनिया को देखने का होता है, तो कभी खुद ही एक नजारा बन जाता है। इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर होता है। इसका एक उदाहरण हम आम जीवन में भी देख सकते हैं। मान लीजिए, एक युवती शाम को अपने बिगड़े हुए मूड के साथ बैठी है। उसके मित्र ने पूछा, “आज आपका मूड इतना खराब क्यों है?” युवती ने जवाब दिया, “सुबह ब्यूटी पार्लर में पांच हजार रुपए खर्च किए, लेकिन पूरे दिन किसी ने मेरी तरफ ध्यान तक नहीं दिया। लगता है या तो सब अंधे हैं, या फिर खूबसूरती की कदर ही नहीं रह गई!”
यही दृष्टिकोण आज वैश्विक स्तर पर भी देखने को मिल रहा है, जहां कई देश खुद को “प्रथम श्रेणी का देश” घोषित करने में लगे हुए हैं।
ब्रिटेन से अमेरिका तक: वैश्विक शक्ति का बदलता स्वरूप
एक समय था जब ब्रिटेन अपने आत्मविश्वास और सैन्य ताकत के बल पर दुनिया पर राज करता था। उसका अंदाज़ अनूठा था, इसीलिए वह “यूनाइटेड किंगडम” कहलाया। लेकिन आज ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था संकट में है, और वह पाउंड की तरह ही कमजोर पड़ता जा रहा है।
वहीं, अमेरिका जैसा धनाढ्य देश भी अपनी नीतियों के कारण चर्चा में है। डोनाल्ड ट्रंप ने हाल के चुनावों में एलन मस्क के समर्थन से जीत हासिल की, लेकिन बाद में उनके रिश्ते खराब हो गए। मस्क ने अपनी नई पार्टी बनाकर ट्रंप को चुनौती दी, जिससे साफ हो गया कि वह किसी से कम नहीं।
ट्रंप की कठपुतली राजनीति और वैश्विक प्रभाव
ट्रंप ने अपने कार्यकाल में पूरी दुनिया को कठपुतली की तरह नचाने की कोशिश की। उन्होंने टैरिफ लगाकर चीन और भारत जैसे देशों को धमकाया, मानो अमेरिका आज भी वैश्विक मामलों का एकमात्र नियंता हो।
पाकिस्तान को समर्थन: ट्रंप ने पाकिस्तान के दोगले राजनयिक आसिम मुनीर को गोद में बैठाकर डिनर दिया, ताकि पाकिस्तान उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए नामित करे।
ईरान-इजरायल संघर्ष को भड़काना: उन्होंने इजरायल के साथ मिलकर युद्ध की आग को हवा दी, फिर शांति स्थापना का नाटक करके खुद को नोबेल के लिए पेश किया।
हथियारों की बिक्री: इस प्रक्रिया में अमेरिका ने पुराने हथियारों को ऊंची कीमतों पर बेचकर अरबों डॉलर कमाए।
भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत और अमेरिका की चुनौतियां
ट्रंप की टैरिफ नीति का भारत और चीन पर कितना प्रभाव पड़ेगा, यह तो भविष्य ही बताएगा। लेकिन अब दुनिया के देश डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने लगे हैं। अगर यह प्रवृत्ति बढ़ती है, तो “अमेरिका फर्स्ट” की नीति की हवा निकल सकती है।
वहीं, भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और जल्द ही तीसरे स्थान पर पहुंचने वाला है। भारत का युवा बौद्धिक संपदा से भरपूर है, और दुनिया भारतीय बाजार की ओर ललचाई नजरों से देख रही है। ऐसे में, ट्रंप का टैरिफ वाला गुब्बारा ज्यादा देर तक नहीं टिक पाएगा।
इंडिया फर्स्ट की राह पर
भारत को “इंडिया फर्स्ट” की नीति अपनानी चाहिए, ताकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ना न पड़े। मेड इन इंडिया और मेक इन इंडिया जैसे अभियानों को और मजबूती देकर हम विकसित देशों की कतार में शामिल हो सकते हैं। आवश्यकता है तो सिर्फ एक स्पष्ट दृष्टिकोण और दृढ़ संकल्प की।











