आज राष्ट्रऋषि, समाजसेवी, शिक्षाविद और भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य नानाजी देशमुख की जयंती है। उनका जीवन सेवा, समर्पण और स्वावलंबन का प्रतीक रहा है। नानाजी देशमुख का नाम उन महान व्यक्तित्वों में शुमार है जिन्होंने राजनीति को लोकसेवा का माध्यम बनाया और ग्रामोदय के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।
नानाजी देशमुख का जन्म 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के परभणी जिले में हुआ था। बचपन से ही उनमें राष्ट्रभक्ति और समाज सेवा की भावना प्रबल थी। वे बाल्यावस्था में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ गए और जीवनभर संघ के आदर्शों पर चलते रहे। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और गुरुजी गोलवलकर जैसे महान विचारकों से प्रभावित होकर उन्होंने अपना जीवन राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
स्वतंत्रता के बाद नानाजी देशमुख ने राजनीति को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना। वे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ भारतीय जनसंघ की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई। राजनीति में रहते हुए उन्होंने सदैव सिद्धांतों और ईमानदारी को सर्वोपरि रखा। संसद में रहते हुए उन्होंने विकास, शिक्षा और ग्रामीण उत्थान के लिए अनेक योजनाओं का समर्थन किया। परंतु सत्ता के मोह से दूर रहना उनका स्वभाव था। 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी, तब उन्होंने मंत्री पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि “मेरा स्थान गाँवों में है, सत्ता में नहीं।”
नानाजी का जीवन कार्य केवल राजनीति तक सीमित नहीं था। उन्होंने ग्रामोदय आंदोलन की शुरुआत की, जिसके माध्यम से ग्रामीण भारत के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक उत्थान का कार्य किया गया। उनका मानना था कि “देश का सच्चा विकास गाँवों के विकास से ही संभव है।” इसी विचार को उन्होंने चित्रकूट में साकार किया। उन्होंने वहाँ Research Institute – DRI की स्थापना की, जो आज भी आत्मनिर्भर गाँवों के मॉडल पर कार्य कर रहा है।
नानाजी देशमुख का योगदान शिक्षा के क्षेत्र में भी अमूल्य रहा। उन्होंने ग्रामीण युवाओं को शिक्षा, रोजगार और आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रेरित किया। वे तकनीक और परंपरा के समन्वय के पक्षधर थे। उनका जीवन गीता के कर्मयोग का सजीव उदाहरण था
बिना किसी स्वार्थ के, केवल समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए समर्पण।
उनकी निष्ठा, सादगी और सेवा भाव के कारण उन्हें “राष्ट्रऋषि” कहा गया। भारत सरकार ने 1999 में उन्हें पद्म विभूषण और 2019 में भारत रत्न से सम्मानित किया। यह सम्मान केवल नानाजी देशमुख को नहीं, बल्कि उन तमाम कार्यकर्ताओं को समर्पित था जो बिना दिखावे के राष्ट्र निर्माण में जुटे हैं।
नानाजी देशमुख का जीवन हमें यह सिखाता है कि समाज परिवर्तन केवल भाषणों या नारों से नहीं, बल्कि कर्म और सेवा से होता है। आज जब देश आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अग्रसर है, नानाजी के “ग्रामोदय से राष्ट्रोदय” के सिद्धांत पहले से अधिक प्रासंगिक हैं।
उनकी जयंती पर हम सबको यह संकल्प लेना चाहिए कि हम भी उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए समाज और राष्ट्र के उत्थान में अपना योगदान दें — यही नानाजी देशमुख को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।












